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                          *ग़ज़ल * क़रीब पा के तुझे फिर न दिल मचल जाए मेरे ज़िगर में कोई रोग फिर न पल जाए। नक़ाब रुख़ से जो तेरे कभी फिसल जाए मुझे तो डर है कि आशिक़ कहीं न जल जाए। यही है आरज़ू बस इक यही तमन्ना है तुम्हारी दीद के संग दम मेरा निकल जाए। मैं फूँक फूँक के रखता हूँ हर क़दम ऐसे कहीं उन्हें न मेरी बात कोई खल जाए। कि धर्म जाति सियासत ये तीन अज़गर हैं न जाने कौन कहाँ कब किसे निगल जाए। दुआ है माँ की मेरे साथ सर पे आँचल है छुवन में माँ की वो दम है क़ज़ा भी टल जाए। तू है इंसान न घबरा किसी भी मुश्किल में वही है आदमी  हर हाल में जो ढल जाए अभी समय है कि मेहनत को तू बना साधन कहीं न वक़्त यूँ ही हाथ से निकल जाए। ********* काफ़िया-अल रदीफ़- जाए बह्र- 1212   1122   1212   22 ******** डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर।
                              ** विरह वेदना**                                 *********** दिल के तारों को झंकृत कर, मेरी चाहत को 'स्वर' दो हाथ फेर माथे पर मेरी, मेरे क्रंदन को हर लो। कुड़-कुड़ पतिया सी देह भयी, विरह ताप की ज्वाला में, आकर के मुझको प्राण-प्रिये!,शीतल बाँहो में भर लो ।।" मेरे माथे की लाली को, मिलने का ऐसा वर दो विरह व्यथा के शूल सेज पर,तुम अपना करतल धर दो। अँगार पोत सम फूल बने, पानी ज्वाला की बूंदें आकर के मेरे प्राण-प्रिये!,इनके तापस को हर लो।। बन कर मोती आशाओं के, मेरी आँखों से झर लो तुम इस 'तन' का हार बनो जी,'मन' का मुझको 'मनका' कर लो। विरह व्याल डसते हैं निस दिन, मेरी पीड़ा को समझो बना मुझे मदिरा का प्याला, अपने अधरों से धर लो।। *****                              डॉ0 राजीव जोशी              ...
काफिया- अते रदीफ़-हैं। बह्र-1222  1222  1222  1222 †********** सनम को देख कर क्यों रात में जुगनू बहकते हैं निकलते हैं वो जब छत पर तो बादल भी घुमड़ते हैं। सनम जब बोलते मेरे तो मुँह से फूल झरते हैं महकती हैं फ़िज़ाएँ भी गली से जब गुजरते हैं। वो बिखरा कर के लट अपनी किसी गुलशन से जब गुजरें घटा उनको समझ कर मोर निस दिन नाँच करते हैं कभी वो जब भरी महफ़िल में सज धज कर जो आ जाएं न जाने क्यों ज़हाँ वाले मेरी किश्मत से जलते हैं। लबों को क्या कहूँ जैसे गुलाबी पंखुड़ी कोई समझ उनको ही गुल भँवरों के दिल क्यों कर मचलते हैं। हमारे मन के मंदिर में बसी मूरत तुम्हारी है तुम्हीं को याद करते हैं  तुम्हारा नाम भजते हैं। ****** डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर।
**फिज़ूल ग़ज़ल** ******* आइना झूठ सही, मन  तो गवाही देगा दिल पे रख हाथ जरा, सच ही सुनाई देगा। ख़ाक हो जाएंगे वो गौहरे ताबाँ इक दिन वक़्त के हाथ मुक़द्दर जो कलाई देगा। उनके कानों में सियासत की ख़नक बसती है अब कहाँ शोर गरीबों का सुनाई देगा। फ़र्ज़ की राह में लालच से जो बच जाएंगे रब उन्हें प्यार से तौफ़ीके कमाई देगा। अब न 'राजीव' से कहना कि ये क्या लिखते हो हो जिधर दर्द उधर घाव दिखाई देगा। **** काफ़िया- ई रदीफ़- देगा बह्र- 2122   1122  1122  22 **?**??*** डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर।
                       ग़ज़ल                       ***** तुम चले जाओ जो महफ़िल से क़जा हो जाए कुछ न हो पास तो अम्बर ही रिदा हो जाए। ईट गारे का मकाँ हो या कोई झोपड़ हो साथ मिल जाए तुम्हारा तो कदा हो जाए। मेरे हर गीत में तुम बन के बहर बसती हो मैं अगर गाऊँ तो महफ़िल को शुब्हा हो जाए। हाथ जोड़ूँ तो मना लूँ मैं किसी ईश्वर को हाथ फैलाऊं तो फिर हक़ में दुआ हो जाए। चल पड़ा नाम बदलने का ये फैशन कैसा मैं अगर खुद का बदल लूं तो अदा हो जाए। **** डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर। ******* काफ़िया-आ रदीफ़-हो जाए बह्र-2122  1122  1122   22
****ग़ज़ल ****** कभी धरती कभी अम्बर तलाश करता हूँ जहाँ में एक अदद घर तलाश करता हूँ। मैं तो दरिया हूँ समंदर तलाश करता हूँ कोई हसीन मुक़द्दर तलाश करता हूँ। बाद मरने के भी इंसान के जो  साथ रहे मैं वो ही ज़र वो ही ज़ेवर तलाश करता हूँ। टिका है जिस पे इमारत का अहम ये भारी मैं वही नींव का पत्थर तलाश करता हूँ। नज़र के तीर वो ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म उसके मैं वो ही आज भी तेवर तलाश करता हूँ। ****** काफ़िया-अर रदीफ़-तलाश करता हूँ बह्र-1212  1122  1212  22 ******* डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर।
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*गीतिका* पाँव बढ़ाना सोच समझकर काँटे दर-दर बिखरे हैं। सहज नहीं है प्रेम डगर ये पग-पग खंजर बिखरे हैं। हार नहीं है भिन्न जीत से ये तो पहली सीढ़ी है लक्ष्य बना फिर चल हिम्मत से ढेरों अवसर बिखरे हैं। पेड़ कोई फलदार था कितना ये पता करना गर हो उस बगिया में जा कर देखो कितने पत्थर बिखरे हैं। छत, दरवाजे, आंगन घर का खिड़की और सब दीवारें रंग रोगन है बाहर से पर अंदर से घर बिखरे हैं। जीवन है संघर्ष ये हर पल इसका मोल तो पहचानो फूल नहीं जीवनपथ पर तो लाखों कंकर बिखरे हैं। सुर और साज सजें भी कैसे, कैसे महफ़िल में गाऊँ हमदम जब से साथ नहीं हैं गीतों के स्वर बिखरे हैं। देवभूमि उत्तरांचल है ये आके तुम भी देखो तो इस धरती के कण-कण में तो विष्णु-शंकर बिखरे हैं। ***** डॉ. राजीव जोशी बागेश्वर।