******फ़िज़ूल ग़ज़ल **** पास आते हो तो क्यों वक़्त सिमट जाता है क्यों अकेले में मेरा दिल ये गुनगुनाता है। है मुहब्बत का अजब ढंग निराला कैसा कोई आँखों से ही बस दिल में उतर जाता है। झूठ को भी वो बयाँ सच की तरह कर जाए सोचता हूँ उसे कैसे ये हुनर आता है। खूबियाँ कुछ तो रही होंगी मेरे भीतर भी एब मेरा ही भला सबको क्यों दिख जाता है। क़त्ल करता है हुनर से वो सितमगर साकी और इल्ज़ाम मेरे सर पे लगा जाता है। **** डॉ.राजीव जोशी बागेश्वर।
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फ़िज़ूल ग़ज़ल 1
फ़िज़ूल ग़ज़ल ********** बच्चे घरों के' जब बड़े जवान हो गए तब से बुजुर्ग अपने बेजुबान हो गए कुदरत को छेड़ कर हमें यूँ क्या मिले भला खुद ही तबाह होने का सामान हो गए देखो सियासतों का रंग क्या गज़ब हुआ जितने भी' थे' शैतान, वो शुल्तान हो गए यूँ तो किसी भी हुक़्मराँ पे है यकीं नहीं अच्छे दिनों की बात पे क़ुर्बान हो गए कहते थे' दिखावा जिन्हें मेरी गली के लोग मेरे उसूल ही मेरी पहचान बन गए कुछ भी नहीं कहा है मगर देख भर लिया खुद ही की' नज़र में वो पशेमान हो गए जब से तुम्हारा साथ मुझे मिल गया सनम ज़िन्दगी के रास्ते आसान हो गए। डॉ0 राजीव जोशी बागेश्वर
लघुकथा - "धुएँ का छल "
लघुकथा (धुएं का छल) *********************************************** कमल वर्मा एक आदर्श पति और जिम्मेदार पिता था, कम से कम घर में उसकी यही छवि थी। लेकिन बाहर की दुनिया में वह सिगरेट का ऐसा शौकीन था कि बिना कश लिए उसकी रगों में बेचैनी दौड़ने लगती। घर में उसने खुद पर यह नियम थोप रखा था कि परिवार के सामने धूम्रपान नहीं करेगा, पर आज छुट्टी के दिन ऑफिस न जाने के कारण उसकी तलब असहनीय हो गई।....उसने एक चाल चली। फोन उठाया और बनावटी गंभीरता से बोला, “अच्छा! क्या हुआ? कौन से हॉस्पिटल में है? हाँ, हाँ, मैं आ रहा हूँ!” फिर पत्नी की ओर मुड़ा, “सुधीर को पेट दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, मैं देख आऊँ।” यह कहकर वह जैकेट पहनकर घर से निकल पड़ा। ....रात की ठंडी हवा चेहरे पर लगी तो हल्का सुकून महसूस हुआ, लेकिन दिमाग में बस एक ही सवाल गूंज रहा था—सिगरेट कहाँ मिलेगी? उसने कैंट, मालरोड और लाला बाजार की हर गली छान मारी, पर सब दुकानें बंद! गलियों में केवल ठंड से ...





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