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ग़ज़ल ********** आपके बिन दिल ये अब लगता नहीं शोख नज़रों से कोई बचता नहीं।1। आप जब से दिल के मेहमाँ हो गए और कोई अब मुझे जँचता नहीं।2। प्यार से जब तुम गले लग जाते हो जेठ में भी जिस्म ये जलता नहीं।3। सरज़मीन-ए- हिन्द की आवाज है सर यहाँ कट जाए पर झुकता नहीं।4। टूट जाए इक दफा विश्वास जो लाख कर लो कोशिशें जुड़ता नहीं ।5। सामने बैठा रहूँ, सुनता रहूँ आपकी बातों से जी भरता नहीं।6। ****** बह्र-2122  2122  212 काफ़िया-अता रदीफ़-नहीं **** डॉ0 राजीव जोशी बागेश्वर
होली गीत ***** रसिया बालम रसिया रे, रसिया बालम रसिया रे! रंग बसन्ती छाया है पुलकित उर हरषाया है कन्त भी मेरे पास नहीं मिलने की कोई आस नहीं व्याल विरह के डसिया रे!रसिया बालम रसिया रे. मारे सखियाँ पिचकारी लागे फागुन ज्यों आरी धड़कन दिल की बढ़ती है याद पिया को करती है फाड़े चोली, छतिया रे!  रसिया बालम रसिया रे.. सखियों के संग होली में बीते हँसी ठिठोली में सखियाँ हैं सब भरी भरी मैं विरहन बस डरी डरी दिन गुजरा है टोली में रात अमावस होली में काटूँ कैसे रतिया रे!रसिया बालम रसिया रे.. **** फ़िज़ूल टाइम्स FIJOOLTIMES.BLOGSPOT.COM ***** डॉ.राजीव जोशी बागेश्वर।
*******फ़िज़ूल ग़ज़ल बस यही इक सवाल है साहिब क्यों ये शरहद यूँ लाल है साहिब। कब तलक दिन गुजारें निन्दा में खून में अब उबाल है साहिब। फिर गए हो जुबाँ से तुम शायद बदली बदली सी चाल है साहिब। बात करते हो तुम पकौड़ों की दाल रोटी मुहाल है साहिब। रहनुमा गोस्त खा गये सारा शेष हड्डी पे खाल है साहिब। ****** **फ़िज़ूल टाइम्स FIJOOLTIMES.BLOGSPOT.COM ***** राजीव जोशी बागेश्वर।
******फ़िज़ूल ग़ज़ल **** पास आते हो तो क्यों वक़्त सिमट जाता है क्यों अकेले में मेरा दिल ये गुनगुनाता है। है मुहब्बत का अजब ढंग निराला कैसा कोई आँखों से ही बस दिल में उतर जाता है। झूठ को भी वो बयाँ सच की तरह कर जाए सोचता हूँ उसे कैसे ये हुनर आता है। खूबियाँ कुछ तो रही होंगी मेरे भीतर भी एब मेरा ही भला सबको क्यों दिख जाता है। क़त्ल करता है हुनर से वो सितमगर साकी और इल्ज़ाम मेरे सर पे लगा जाता है। **** डॉ.राजीव जोशी बागेश्वर।
*******फ़िज़ूल बसन्त कौन है वो इस जगत में,जो समाया हर तरफ हो गयी मादक दिशाएं,रंग छाया हर तरफ यौवना नव सी धरा के मेघ दीवाने हुए फूल भँवरे और तितली कौन लाया हर तरफ। किसके आने की है आहट क्यों हवा मदमस्त है क्यों धरा ने फिर गलीचा सा बिछाया हर तरफ। फागुनी  तन हो गया और मन बसन्ती हो गया प्रेम की रसधार में हर सू नहाया हर तरफ। फूल, कलियाँ खिल उठी हैं, है धरा पीताम्बरी आगमन ऋतुराज का आनंद लाया हर तरफ। आसमाँ धरती दिशाएं बूढ़े-बच्चे और जवाँ आ गया लो आ गया  ऋतुराज आया हर तरफ। राह 'प्योंली' और 'सरसों' ने सजा दी इस कदर देख अब 'राजीव' भी वो मुस्कुराया हर तरफ। *** डॉ राजीव जोशी बागेश्वर।
***********ग़ज़ल हमसे भी कुछ बात हमारी किया करो सोच समझकर दुनियादारी किया करो। जो भी तुममें स्वाभाविक है बोलो तो बात नहीं तुम यूँ क़िरदारी किया करो। हमें लूटना है तो लूटो जाँ ले लो दिल लेकर मत पाकिटमारी किया करो। सुना सियासत सीख चुके हो दिलवर तुम वादे तुम भी अब अखबारी किया करो। जो भी दिल में है कह दो मत रोओ माँ!  यूँ रोकर मत पलकें भारी किया करो। हर इक बात पे इतना क्यों सोचा करते दिल से भी कुछ रायशुमारी किया करो। पंख लगा कर आसमान तक उड़ने दें बच्चों पर मत चार दिवारी किया करो। ******** काफ़िया-आरी रदीफ़-किया करो बहर-22  22  22  22  22  2 **** डॉ.राजीव जोशी फ़िज़ूल टाइम्स
फ़िज़ूल ग़ज़ल ****** ग़ज़ल अभी आना व जाना चल रहा है कहो कैसा फ़साना चल रहा है। जुबाँ कुछ भी वहाँ पर कह न पाए नज़र से ही बताना चल रहा है। नहीं हैं गर्म रिश्ते खून के भी यहाँ केवल निभाना चल रहा है। निशाँ कुछ तो यक़ीनन छोड़ आया मेरे पीछे जमाना चल रहा है। हवाएं हर तरफ हैं खुशनुमा सी लगे मौसम सुहाना चल रहा है। **** डॉ.राजीव जोशी बागेश्वर।