काफ़िया-आने
रदीफ़- हो गए
बह्र-2122    2122     2122     212
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वक़्त की रफ्तार में ये क्या फसाने हो गए
खो गया बच्चों का बचपन वो सयाने हो गए।

बस किताबी ज्ञान में उलझा हुआ है बचपना
खेलना मिट्टी में कंचों से जमाने हो गए।

वो किताबों से न जिनका था कोई रिश्ता उन्हें
ज्यों संभाला होश तो पैसे कमाने हो गए।

डर नहीं है आदमी को डोलती इंसानियत
फर्ज़ से बचने के भी सौ सौ बहाने हो गए।

कल सियासत के भी कुछ आदाब थे आदर्श थे
आज ये बस ज़ुर्म ढकने के ठिकाने हो गए।

शब्द जो भी थे ज़ुबाँ पर लेखनी में आ गए
हर्फ़ कागज़ पर जो उतरे तो तराने हो गए।

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डॉ. राजीव जोशी
बागेश्वर।

Comments

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 29 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 30 अक्टूबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. गज़ब की ग़ज़ल
    वाह

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  4. वाह ...
    लाजवाब शेरो का गुलदस्ता... कुछ यादों को छूता हुआ ...

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    1. उत्साहवर्धन हेतु हृदयतल से आभार

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